मोहन भागवत बोले: 75 की उम्र में रिटायरमेंट ज़रूरी नहीं, जब तक ज़रूरत है काम करते रहेंगे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने अपने हालिया विवादास्पद बयान पर सफाई देते हुए कहा है कि उन्होंने न तो खुद संन्यास लेने की बात कही है और न ही किसी और के बारे में ऐसा कोई सुझाव दिया है। उनके इस स्पष्टीकरण ने विपक्षी दलों, खासकर राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा जताई जा रही उम्मीदों पर पानी फेर दिया है कि संघ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 75 साल की उम्र के बाद पद छोड़ने का संकेत देने की कोशिश कर रहा है।

भागवत ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जो कहा वह पूर्व आरएसएस स्वयंसेवक मोरोपंत पिंगलेजी की मज़ाकिया टिप्पणी पर आधारित था, जिन्होंने अपने 75वें जन्मदिन पर शॉल प्राप्त करते हुए कहा था, "अब आपकी उम्र पूरी हो गई है, यह काम दूसरों को सौंप दीजिए" और इसे नीतिगत बयान नहीं माना जाना चाहिए।

संघ में कोई आयु सीमा नहीं है 


उन्होंने दोहराया कि संघ में सेवानिवृत्ति की कोई निश्चित आयु नहीं है। संघ चाहे तो स्वयंसेवक 80 वर्ष की आयु में भी शाखा चला सकते हैं। इसमें कोई सेवानिवृत्ति लाभ नहीं है और सब कुछ संगठन की आवश्यकता के अनुसार तय होता है।

भाजपा और राजनीतिक संतुलन पर प्रभाव


इस बयान ने भाजपा के भीतर नेतृत्व संघर्ष की आशंकाओं को शांत कर दिया है। साथ ही, विपक्ष के लिए छिछले बयानों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता भी बंद हो गया है। पूरी व्याख्यानमाला ने यह संदेश दिया कि संघ-प्रभार का संरक्षण प्रधानमंत्री मोदी को 2029 तक जारी रह सकता है।

मोहन भागवत का रिटायरमेंट पर यह स्पष्टीकरण संघ की संरचनात्मक स्पष्टता और आत्म-प्रक्रष्टि का दस्तावेज है। यह साबित करता है कि सेवा और समर्पण का सिद्धांत उम्र या पद से नहीं, बल्कि संगठन के विश्वास पर आधारित है। और, यह बात भाजपा के नेतृत्व और विपक्ष दोनों को नए राजनीतिक संतुलन की ओर ले जा रही है।

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