सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए. एस. ओका ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण वक्तव्य देते हुए कहा कि भारत में घृणा फैलाने वाले अधिकांश भाषण धार्मिक अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के खिलाफ होते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई बार राजनीतिक लाभ के लिए नेता ऐसे भाषण देते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है। न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि इन भाषणों का उद्देश्य अक्सर बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काना होता है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बताया कि देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां चुनावी लाभ या राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समाज को सांप्रदायिक रूप से विभाजित करने की कोशिश की गई।
नफरत को रोकने का उपाय – 'शिक्षा'
हालांकि भारतीय दंड संहिता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत ऐसे भाषण अपराध की श्रेणी में आते हैं, फिर भी जस्टिस ओका का मानना है कि इससे निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है — जनता को शिक्षित करना। उन्होंने कहा, "हमारे संविधान की प्रस्तावना में 'बंधुत्व' को विशेष स्थान दिया गया है। यदि हम समाज को बंधुत्व की भावना के प्रति शिक्षित करें, तो इस प्रकार के नफरत फैलाने वाले भाषणों में कमी लाई जा सकती है।"
जस्टिस ओका ने इस बात पर भी जोर दिया कि नफरत फैलाने वाले भाषणों को दंडित करने की प्रक्रिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि "मात्र इसलिए कि कुछ लोग किसी विचार से असहमत हैं, उसे नफरत फैलाने वाला नहीं कहा जा सकता।"
अपने हालिया फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्यांकन "कमजोर मानस" के बजाय "साहसी और जागरूक नागरिक" के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।
कॉमेडी, व्यंग्य और विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा
कोलंबिया लॉ स्कूल में "घृणास्पद भाषण: धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के विरुद्ध" विषय पर भाषण देते हुए जस्टिस ओका ने स्टैंड-अप कॉमेडी और व्यंग्य को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनिवार्य अंग बताया। उन्होंने कहा कि "यदि हम कॉमेडी और व्यंग्य जैसे अभिव्यक्ति के साधनों को खत्म कर देंगे, तो सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार भी खतरे में पड़ जाएगा।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि विरोध और असहमति लोकतंत्र की रीढ़ हैं। "हर लोकतंत्र में असहमति का अधिकार जरूरी है। विश्वविद्यालयों को छात्रों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की अनुमति मिलनी चाहिए। केवल नफरत फैलाने के प्रावधानों का उपयोग करके इसे दबाना अनुचित है।"