मुंबई जैसे विकसित महानगर के उपनगरीय क्षेत्र में कुपोषण की गंभीर स्थिति सामने आई है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए एक प्रारंभिक सर्वेक्षण के अनुसार, फरवरी 2025 तक कुल 16,343 बच्चे कुपोषण से प्रभावित पाए गए हैं। इनमें से 2,887 को गंभीर रूप से कुपोषित और 13,457 को मध्यम रूप से कुपोषित श्रेणी में रखा गया है। यह जानकारी पोषण ट्रैकर ऐप पर दर्ज आंकड़ों के आधार पर सामने आई है, जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया है।
फरवरी माह में कुल 2,38,094 बच्चों का पंजीकरण हुआ, जिनमें से 2,34,896 बच्चों की लंबाई और वजन मापे गए। इन आंकड़ों ने कुपोषण की एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि देश की आर्थिक राजधानी में भी बाल पोषण को लेकर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। मुंबई उपनगरीय जिले के संरक्षक मंत्री आशीष शेलार ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया है कि वे अगले दस दिनों के भीतर कुपोषण से निपटने के लिए एक ठोस कार्य योजना तैयार करें। उन्होंने अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की, जिसमें जिला कलेक्टर राजेंद्र क्षीरसागर सहित विभागीय अधिकारी भी मौजूद रहे।
श्री शेलार ने कहा, "प्रशासन को जल्द से जल्द प्रभावी उपायों को अंतिम रूप देना चाहिए और दस दिनों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए, ताकि बच्चों को जल्द से जल्द राहत पहुंचाई जा सके।"
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत, अक्टूबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच पंजीकृत बच्चों की स्वास्थ्य जांच भी की गई, जिसमें 1,159 बच्चे गंभीर रूप से और 3,096 बच्चे मध्यम रूप से कुपोषित पाए गए। अकेले फरवरी 2025 में यह संख्या घटकर क्रमशः 450 और 407 रही, जिससे संकेत मिलता है कि समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा रहा है, लेकिन चुनौती अभी भी कायम है।
प्रशासन अब इस दिशा में कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के लिए अतिरिक्त शहरी बाल विकास केंद्र स्थापित करने की योजना पर काम हो रहा है।
वहीं बृहन्मुंबई महानगर पालिका का स्वास्थ्य विभाग सर्वेक्षण कार्य में तेजी लाने के लिए जुट गया है, ताकि और अधिक बच्चों को चिन्हित कर उन्हें शीघ्र पोषण सहायता मुहैया कराई जा सके।
मुंबई उपनगर जैसे क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में कुपोषित बच्चों का सामने आना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है—जो दर्शाता है कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक विकास पर भी उतना ही ध्यान देना ज़रूरी है।